सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में माना है कि गृहिणी द्वारा परिवार को प्रदान की जाने वाली घरेलू देखभाल (Domestic Care) का नुकसान मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक स्वतंत्र और प्रतिकर योग्य (Compensable) क्षति का आधार है। न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि गृहिणी की घरेलू सेवाओं का न्यूनतम आर्थिक मूल्य ₹30,000 प्रति माह माना जाएगा।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने Shishupal @ Shish Ram & Ors. v. Surjeet & Ors. (SLP(C) No. 33915/2025) मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि गृहिणी का योगदान केवल घर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति संजय करोल ने कहा कि एक गृहिणी मनुष्य के विकास के साथ-साथ राष्ट्र के विकास में भी योगदान देती है। इसलिए मोटर दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु या गंभीर अक्षमता की स्थिति में परिवार को होने वाली "घरेलू देखभाल की हानि" को मुआवजा निर्धारण के दौरान अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। इसी दृष्टिकोण को अपनाते हुए न्यायालय ने घरेलू सेवाओं का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रतिमाह निर्धारित किया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि "Loss of Domestic Care" मुआवजे का एक अतिरिक्त आधार होगा, जो पहले से मान्य पारंपरिक मदों (Heads of Damages) के अतिरिक्त लागू होगा। ये पारंपरिक मद सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध निर्णय National Insurance Company Ltd. v. Pranay Sethi में निर्धारित किए गए थे।
न्यायमूर्ति करोल ने यह भी आशा व्यक्त की कि भविष्य में "होममेकर" (Homemaker) शब्द को "राष्ट्र निर्माता" (Nation Builder) के रूप में देखा जाएगा। उन्होंने कहा कि गृहिणियां परिवारों की नींव तैयार करती हैं और उनका योगदान आर्थिक आंकड़ों में भले दिखाई न दे, लेकिन उसका महत्व अत्यंत व्यापक है।
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के उस विकसित होते न्यायशास्त्र की अगली कड़ी है, जिसमें न्यायालय लगातार गृहिणियों के अवैतनिक घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्य को मान्यता दे रहा है। वर्ष 2024 में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह धारणा गलत है कि गृहिणियां काम नहीं करतीं, और उनकी अनुमानित आय (Notional Income) किसी दैनिक वेतनभोगी श्रमिक के न्यूनतम वेतन से कम नहीं मानी जानी चाहिए।
मुआवजा निर्धारण के सिद्धांत तय करने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा मामलों के शीघ्र निस्तारण पर भी जोर दिया। न्यायालय ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 169 का उल्लेख करते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों (MACT) में सारांश प्रक्रिया (Summary Procedure) को उसके वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अपेक्षा की कि वे मोटर दुर्घटना दावा मामलों की निगरानी करें, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय और मुआवजा मिल सके।
इस मामले का विस्तृत निर्णय अभी उपलब्ध होना बाकी है।
मामला: Shishupal @ Shish Ram & Ors. v. Surjeet & Ors.
केस नंबर: SLP(C) No. 33915/2025
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